जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना भाग 3

           जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना भाग 3

जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना भाग 3
जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना भाग 3

यदि कोई व्यक्ति बांस की तरह होगा तो सतगुरु की संगति चंदन की भाति कुछ नहीं कर पायेगी। पारस तांबे के साथ रखी जावै तो वह पारस तांबे को सोना बना देती है, मीठा कड़वे के साथ रखा जाये ओो भीठा कड़िया को भी मीठा बना देता है। गुरु मिलने का यही उपकार है, सभी कुछ पलट देते है।

 ये सतगुरु तो जल का दूध,नींबू के नारियल करते है। लोहे को पलट कर कंचन करते है, मैं तो जैसलमेर का राजा कहा जाता है। झूठ, कपट, पाखण्ड में विश्वास नहीं करता। मैंने जाम्भोजी में सच्चाई देखी है तब मैं विश्वास को प्राप्त हुआ हूँ।

ग्वाल चारण जैतसर से विनती करने लगा- मैं चारण कविता करता हूं किन्तु जाम्भोजी के बारे में झूठा अक्षर नहीं जोड़ पाता। मैंने कई बार प्रयत्न करके देखा भी है किन्तु खाली ही रहा है, न जाने मुझे जाम्भोजी का कोई शाप है अब मुझ पर कृपा करेगे। मैं अपनी भूल की क्षमा चाहता हू।

 बहुत बात हो गयी अब चढो चढो कहते हुए जाम्भोजी के आदेशानुसार सेवक गण एवं रावल जो जैसलमेर के लिये रवाना हुऐ । रावल मन में खिन्न था कि मैंने मालिक को बहुत कष्ट पहुचाया है परन्तु अब में साक्षात दर्शन कर रहा हूँ। इस प्रकार से सहज भाव से जैसलमेर में प्रवेश किया। जैसलमेर के राज दरबार में न जाकर जैत संमद पर ही जांभोजी ने आसन लगाया।

सम्पूर्ण शहर में जय जय होने लगी प्रजागण, स्त्री पुरूष गुरु जी के चरणो में नमन करते हुऐ दर्शन लाभ करते हुऐ कृतार्थ हो रहे गुरु देव की सभा देव लोक की सभा की भांति शोभायमान हो रही थी जिसने भी देखा उन्हीं के पाप एवं संशय का विनाश हुआ। जिस प्राणी के अन्दर कभी झूठ कपट की वासना नहीं उभरती सदा ही प्रिय हित कर बोलता है जप तप सद क्रिया में लीन है ऐसे सुगुरु जन की भाट लोग विड़दावली गाते है।

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 रावल कहने लगा – हे देव। अब मुझे आगे क्या करना है वह आप ही आज्ञा प्रदान करे। जैसा आप कहेगे वैसा ही मैं करूंगा, मैं आपका सेवक हूं, जब तक आप आज्ञा प्रदान नहीं करेगे तब तक मेरा मन शांत नहीं होगा।

 देवजी ने कहा – प्रथम आज्ञा तो मेरी यह है कि तुम्हारे ठाकुर, मित्र, सम्बन्धी राजा प्रजा लोग तुम्हारे से मिलने के लिये आये है तुम्हारी भेंट हेतु बकरे लाये है, जो तम्बूओ में बन्धे खड़े है, ये सभी कटेगे। ये जीव निरपराधी है इन्हें छोड़ना होगा। इन जीवो को अमर करदो। यह पुण्य का कार्य करो यह प्रथम वरदान है।

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 दूसरी बात यह मान्य होगी कि तुम्हारे राज्य में जहां पर भी भेड़,बकरिया बकरे को जन्म देती है उसे ये तुम्हारे लोग मार कर खा जाते है। उन जीवो को बचाना होगा। इसके लिये’ अमर रखावै ठाट” जीवो को मरने न दे उनका पालण पोषण करे, यह तुम्हारे लिये दूसरा नियम होगा।

 तीसरी आज्ञा यह है कि जहां तक तुम्हारे राज्य की सीमा है और तुम्हारी शक्ति चलती है वहां तक वन्य जीव मारने वाले शिकारी से जीव जन्तुओ की रक्षा करो। जितने जीवो की रक्षा होगी उतनी ही तुम्हारे राज्य में सम्पन्नता आयेगी। सदा खुशहाली बनी रहेगी। जीव को मारकर अपना पेट भरोगे तो वे जीव आपको सुख नहीं दे सकते। उन्हीं जीवो की तरह तड़प तड़प कर मरोगे। यही तीसरा वरदान आज्ञा है इसे पालन करो।

 चौथी आज्ञा यह है कि तुम्हारे राज्य में चोर बहुत है। दूसरे राज्य की सीमा से पशु चोरी कर के लेकर आते है और तुम्हारे राज्य की सीमा में प्रवेश करते ही चोर साहुकार हो जाता है। पीछे उनका मालिक ढुंढने आता है किन्तु उस भी कुछ नहीं मिलता है,यह अन्याय हो रहा है।इस अन्याय को रोकना होगा तुम्हे जिसका पशु है उसका वापिस दिलाना होगा,तभी न्याय

होगा।प्रजा के साथ न्याय करोगे तभी तुम सच्चे अर्थों में राजा कहलाने के अधिकारी होगे।यही चौथी आज्ञा है।

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