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चित्तौड़ की कथा भाग 3

                        चित्तौड़ की कथा भाग 3

चित्तौड़ की कथा भाग 3
चित्तौड़ की कथा भाग 3

इस प्रकार से परब्रह्म परमात्मा ने परचा दिया और भीयो को विश्नोई बनाया। भीया सेवक साधु हुआ और जाम्भोजी की स्तुति की। सतगुरु मिल गये जन्म जन्म के पाप कट गये अन्तर्यामी तो दिल की बात जानते है सेवक अधिकारी को पहचानते है।

 पुरबिया जो चितौड़ से आये थे, उनसे देवजी ने कहा आप से रानी अवश्य ही पूछेगी तो उनसे यही मेरा शब्द कहना, जो मैं यह सुनाता हूं। इससे रानी को पिछले जन्म की बात याद आ जायेगी इस प्रकार से “आतर पातर “शब्द सुनाया

 शब्द में लाया कि मेरी नगरी थी वहां मेरे साथ अति पवित्र रानी रूपमती थी। वो भी सीता का ही अवतार थी। मन्दिर महल,द्वारका स्वर्णमयी मेरी नगरी थी सोने के महल थे तो क्या मैं उनसे मोह करता?

 आप लोग रानी से कहना कि मैं पूर्व जन्म में कृष्ण था। और द्वारिका स्वर्णमयो

 इस समय तो मैं अकेला हूं। यहां बागड़ देश में रात्रि होते ही सर्दी पड़ने लगती है सूर्योदय होने पर भंयकर गर्मी पड़ती है यहां पर प्राकृतिक प्रकोप तो देखिये गर्म ठण्डी हवाऐ अबाध गति से चलती रहती है कभी सूखा पड़ जाता है तो कभी अत्यधिक वर्षा होती है ये असहनीय है किन्तु यहां पर दुनिया वाले भी टिकने नहीं देते है।

कोई न कोई दुख दर्द लेकर खड़े हो रहे है प्रतिदिन कोई न कोई औचाट विन लेकर खड़े ही रहते है कई कई भले आदमी भी है किन्तु अधिकतर तो नुगरे लोग हो है जो गहरो गहरी गालियां देते है।

 जिस शरीर पर त्रेता द्वापर में मल मल के सुन्दर वस्त्र पहना करते थे उसी शरीर पर अथ ऊन के वस्त्र पहने जाते है उस समय हाथों में हीरों की माला थी किन्तु इस समय तो काठ के मनको की माला है बारह करोड़ प्राणियों के उद्धार हेतु मैं यहां पर आया हूँ मेरा वहां स्वर्ग लोक से यहां आना हुआ है,

 वियोग हुआ है। पिछली बातें याद करता हूं तो मैं भी रोता हूं विलाप करता उस समय त्रेता युग में वनवास हुआ था केवल चौदह वर्ष का ही किन्तु लक्ष्मण सीता साथ थे। मुझे धैर्य कौन बंधायेगा। मगरे के चौड़ी मणिये,काच कथिर कहाँ । हीरे के मनको की बराबरी कर सकते है हीरा तो होरा हो होता है काच कथिर चीड़ी मणियें तो अपने स्थान पर निकृष्ट ही है।

 वियोग तो पड़ता ही आया है। आगे भी पड़ता हो रहेगा। किन्तु वियोग दुख में दुखित न होवे वही शूरवीर है। जो पहले कभी दुखिया थे वे अब सुखो हो जायेगे. राज करेगे। यह तो समय का फेर हैं।

 पूर्ण पुरूष तो वही है जो अपने कर्तव्य पर जा रहे। जो युद्ध भूमि में जाकर सूरवोर जाये खही सच्चा सुरवीर है यहां समराथल पर गर्मियों में तो अंगूठी को तरह यहां पृथ्वी का वातावरण तप जाता है जेठ के महिने ठण्डा जल उपलब्ध नहीं होता है। न तो यहां सोने के लिये पलंग है और नहीं बिछाने के लिये आज ही है। गले में हीरों की माला भी नहीं है जो पहले कभी थी।

इन प्राकृतिक सांसारिक परिस्थितियों से | शिम्भु घबराता नहीं है नहीं सुख का लोभ ही है। और नहीं किसी प्रकार का मोह भी है यह तो सौर संस्कार की बात है कभी किसी से संयोग तथा कभी किसी से वियोग होना निश्चित ही है।

 हम अयोध्या में बाल्यावस्था में खेल खेलते में। की नचाते थे, उस समय भाई लक्ष्मण मेरी आ | में चलता उस समय वनवास में सीता लक्ष्मण साथ में रहते थे जब सीता का हरण हुआ तो उस समय हनुमान साथ में थे। अपने सुख दुख की वार्ता कर लेता था किन्तु इस समय तो मेरे साथ कोई नहीं है।मै अपनी सुख दुख की बात किससे कहूं।

श्री देवजी ने यह शब्द रूपी भेंट झालो रानी के पास भेजा क्योंकि इस शब्द को सुनते ही पूर्व जन्म की प्रोति संस्कार जग जायेगे अपने आप को पहचान लेगी कि मैं कौन हूँ। अन्य भेंट भी सोनवी नगरी से लायी हुई दो। प्रथम शब्द,दूसरो झारी,तोसरी माला,चौथी सुलझावणी। श्री देव ने कहा – ये चारो वस्तुएं रानी को देना। रानी अपने पीव परमेश्वर को परख लेगी।

 देवजी ने कहा – यह झाली रानी का जीव सोता का है पूर्व जन्म में यह सीता थी। साथरियों ने पूछा हे महाराज ! तीन लोक की माता सीता ने चितौड़ के राज दरबार में राणो बन कर क्यों आयो ? उसने मत्य लोक में क्यों जन्म लिया ? श्री देवजी ने कहा- जब पंचवटी में वनवास का समय व्यतीत कर रहे थे उस समय रावण का मामा मारीच कपट का मुंह बन कर के आया था उस समय सीता छलो गयी थी। अन्त समय तक सीता के दिल से बह मृग निकल नहीं सका था। यह मेरा है मुझे प्राप्त हो जाये। यही भावना सीता की बनी थी।

 इसलिये वही मारीच यह सांगा राणा है जो रानी का बेटा बन कर आया। मारीच मृग भी सीता के सौन्दर्य को देखकर मोहित था कि यदि ऐसो सुन्दर मेरी मां होती तो कैसा था? यह मेरी मां बने। इसी भावना सेमारीच भी बेटा बना और सीता झालोराणी बन कर आयी”अन्त मति सो गति”

 इस विषय में कभी भी अक्षर नहीं मानना। शिवजी के साथ सती दक्ष की बेटी थी। किन्तु दूसरे जन्म में वही हिमाचल राजा के घर जन्म लिया। तथा सीता भी ऋषियों के खून से जन्मी थी वह राजा जनक की बेटी बनी। कृष्ण को पटरानी रूक्मणी साधारण से राजा भीम के घर जन्मी थी जीव हो प्रेम के आवेग में भगवान की पत्नी बन जाता है। इसी प्रकार से सीता भी सांगाराणा की मां बन गयो। किन्तु अब इसे ज्ञान हो गया है।

 त्रेता से लेकर अब तक ये जीव स्वर्ग वासी थे। अब जन्म ले लिया है क्योंकि वासना ही जन्म का कारण बनती है। अब आगे पुनः जन्म नहीं होगा इस समय मैं झालोराणी बोध कराऊंगा। इसलिये इली को झारी माला आदि भेज रहा हूं यह मेरी सौगात भेट है राणी इस समय अपने को विधवा हो समझती है भक्तिमती राणी को यह स्मरण दिलाना है कि मेरा पति परमेश्वर है तू कभी अनाथ नहीं हो सकती,सदा ही सनाथ है।

 सतगुरु ने चारो वस्तुऐ देकर साथ में अपने दो सेवकों को भी भेजा। और उन्हें समझाया कि प्रथम तो राणी को ये वस्तुऐ भेंट देना। फिर राणा को भी सचेत करना क्योंकि सांगा मारीच का जीव होने से श्रद्धालु है उसी को तो मैंने राम रूप धारण कर मारा था।

 श्री देव के आदेश को स्वीकार कर के छः जने चितौड़ को रवाना हुऐ और उमंग के साथ चलत हुए कुछ ही दिनों में चितौड़ पहुंच गये। रानी अति आतुरता से प्रतीक्षा कर रही थी। महलो पर चढ चड कर समराथल की तरफ देखती थी।

 विश्नोइयों ने चित्तौड़ शहर में प्रवेश किया तो रानी ने छः सेवक आते हुए देखे। अच्छी प्रकार से देख कर नृत्य किया और मन ही मन में कहा – आतो गये। न जाने समाचार क्या लाये है। साथ में घोड़ा गाड़ी भी है। लगता तो ऐसा ही है कि कार्य सिद्ध कर के आये है।

 रानी अपने विश्वास पात्र सेवको को भेजा और कहा कि उन लोगो को सौधे महल में हो बुला लाओ। सनी ने देखा कि कोई राजा आया होगा किन्तु ये तो भगवान के भक्त आये है। सिर पर टोपी पहनी हुई हैं,वको यहां महल में ही बुला लाओ। अवश्य ही कोई अच्छी खबर लेकर आये है। जाम्भोजी के रोषका प्रथा राज दरबार में पहुंच कर सांगा को भेंट स्वरूप वस्तु प्रदान की और कहा

 आप स्वंय निरंजन परमेश्वर ने ये भेंट आपके लिये भेजी है और कहा है कि हे राजा | आपने विश्नोइयों से डाण मांग कर अन्याय किया है आप इनसे ढाण मत लीजिये। ये रोवक भक्त है जो कुछ आपको चाहिये मैं आपको दूंगा। जो दूंगा वह अखूट होगा आप भत्तो से खण लेते है इसे बन्द करे यह आपके लिए ठीक नहीं है राणा ने भेंट स्वीकार की तब दूसरी राणी की विशेष भेंट उनको प्रदान की। राणी ने अपने पति परमेश्वर की भेजी हुई भेंट प्राप्त कर के बड़ी प्रसन्न हुई अपने पूर्व जन्म की स्मृति हो आयी।

 रानी ने पूछा अन्य कोई मेरे लिये क्या आज्ञा फरमाई है। सेवकों ने जाम्भोजी द्वारा दिया हुआ शब्द पढ़ कर सुनाया। और कहा कि यही बस आपके लिये सौगात है। राणी ने सेवकों को अन्दर बुलाया और उन्हें बहुत बहुत धन्यवाद दिया राणी ने भेंट स्वीकार करते हुए शब्द को बार बार पढ़ा।

अपने पूर्व जन्म की याद करके सिर धुनने लगी और अपनी सहेली से कहने लगी हे सखी । अब मुझे पूर्व की याद हो आयी है थोड़ी सी भूल की वजह से मेरा हरण हुआ था मेरे पति राम को कितना कष्ट हुआ।मैंने लक्ष्मण की बात मानी नहीं । मेरा मेरे पति से वियोग उस समय हुआ था। इस समय भी में मोह माया की वजह से जन्म लेकर आयी हूं। सत्य ही फरमाया है श्री देव ने अब मेरे पति परमेश्वर साक्षात् विष्णु समराथल पर विराजमान है।

 मुझे ज्ञान हो चुका है अब मैं एक बार दर्शन अवश्य ही करूंगी। या मुझे यही पर आकर दर्शन देगे। मैं निहाल हो गयी हूँ मैं तो संसार की मोह माया में पड़कर भूल ही गयी थी। कि मैं कौन हूँ अब मुझे ज्ञान करते हुए देखकर सहेली कहने लगी

 हे विश्नोइयो । आपने कोई छल,कपट,कोई जादू-टोना किया होगा जिससे रानी इस प्रकार से | विलाप कर रही है विश्नोइयो का रानी की सहेली साथ वाद विवाद को सुन कर रामी सचेत होकर कहने लगी – आप हमारे देवता है। उठकर चरणों में गिर पड़ी।

सेवको ने कहा- हे मात । उठ जाओ । हमारे चरणों का कोई प्रभाव नहीं है यह तो उन्हीं के चरणों की सेवा का फल है जो आज हम आका दर्शन कर सके। अन्यथा हमारे में इतनी योग्यता कहां है

 राणी कहने लगी- वह देवता कहां रहते है उनका दर्शन सुलभ होगा कि नहीं ? आप ही सुनाइये वे देवता कैसे है ? इस शब्द पत्री द्वारा मुझे ज्ञात हुआ है कि देवजी दुखी है तो संसार में सुखी कौन है ? सेवक कहने लगे जैसा आपको पत्र द्वारा बताया है वैसे ही देवजी रहते है किन्तु दुखी नहीं है सिरजन हार में बतलाया है कि जैसे वैसे ही सुखी है वे झूठ नहीं बोलते जिस प्रकार से चीटिंगो के बिल पर ऊंट को बाध देते है तो वह सुखी कैसे हो सकता है।

 देवजी दुनिया का भला करने के लिये उदास रहते है उन्हे भोग वस्तु की इच्छा नहीं है धरती की भांति पैर्यवान है दुनिया का दुख दूर करने के लिये एक पैर पर खड़े रहते है रानी अपने पूर्व जन्म को याद करके कहने लगी 

 मैंने कौन सा अपराध किया था कि राम ने मुझे त्याग दिया था। यदि त्यागना ही था तो मुझे सीता रूप | में बनाया ही क्यों था। यदि अपनी भाषा बना ली तो फिर क्यों त्याग किया। राम लक्ष्मण द्वारा संधी हुई कार को लोप दिया था। लक्ष्मण की मर्यादा थी, शशि थी। उसका आपने यापन किया है आपको वियोग सहन करना पड़ा।

रानी ने अपने पूर्व जन्म की कथा सुनी तो आंखों में आंसू निकल आये। रोने लगी ऐसी वार्ता संतो से सुनकर रानी अपने आप को पहचान गयी। रानी ने शब्द श्रवण किया,लंबी श्वासे ली और कहने लगी – है देव ! आप मुझे अपने से विलग क्यों कर रहे हो। रानी यार बार प्रणाम करती हुई आंखो में आंसू भर लाई शरीर में रोमांचित होने लगा अधिक कुछ कहने में समर्थ नहीं हो सकी।

हे देवजी मैं तो आपकी जन्म जन्म की दासी हूं। हे कर्ता | आपने मुझे गर्भवास में क्यो भेजा ? यहां पर तो मैं और मेरा के मोह चकर में आपको तथा अपने को हो भूल गयी थी। मैं अपने पति से वियोग को प्राप्त हो गयी थी। अब तो मेरा जन्म मरण मिटा दीजिये। और सदा के लिये अपने पास बुला लीजिये। मैं तो जीव हूं आप मेरे परमेश्वर है। राणी ने सांगा को बुलाया और कहा-बेटे ! ये विश्नोई मेरे गुरु भाई है।

तुम इनके चरणों में प्रणाम करो। जाम्भोजी ने मेरो इच्छा पूर्ण की है। तुम्हारी भी करेगे इन विश्नोइयों से अपनी सीमा में किसी प्रकार का डाण नहीं लेना । हे बेटा तू तो पूर्व जन्म का मारीच था जो राम के बाण से मारा गया था। मैं सीता थी मेरा बेटा बनने को मरते समय तुम्हारी वासना थी वह वासना अब पूरी हो गयी है अब तेरा भी जन्म सफल हुआ है और मेरा भी। ये जाम्भोजी स्वंय राम विष्णु कृष्ण है।

 राणा सांगा ने विश्नोइयो का आदर किया और पांचो कपड़े पहनाऐ उन्हें डाण माफकर दिया। जाम्भोजी को सिरजन हार अम्बेश्वर मान कर के शिष्य बनना स्वीकार किया।जाम्भोजी के नियमों में चलने का प्रयास करने लगा। उनके साथ ही रायसल और वरसल भी विश्नोई बने झालीराणी के साथ अन्य बहुत से लोग विश्नोई बने और अपने जीवन का कल्याण किया।

विधी से चलने पर सतगुरु ने उन्हें स्वर्ग का अधिकारी बनाया। बारह करोड़ प्राणियों में ये भी प्रहलाद पंधी जीव ही थे जिन्हें सचेत किया। सांगा राणा एक समय सम्भराथल आये और देव दर्शन करके अपने को कृत्य कृत्य माना। अपने राज्य में विश्नोई बसाने की प्रार्थना की ? तब जम्भेश्वर ने कहा -जो विश्नोई व्यापारी पूर्व देश के है, वे लोग जो तुम्हारे राज्य में आये थे उन्हें ही आप अपने राज्य में बसालो। इस प्रकार

से चित्तौड़ राज्य में विश्नोइयों के गांव बसे थे। वे गांव- भीलवाड़ा, पुर,दरीबा,संभेलिया और मांडल आदि। सोने की मूण जैसलमेर के राजा जेतसी को दीगयी। उस पर उन्ही का नाम था।

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