स्थापना दिवस • आरती

ॐ शब्द सोऽहं ध्यावे

गुरु जम्भेश्वर भगवान की आरती, अर्थ सहित

॥ जम्भ भक्ति ॥

पद १

ॐ शब्द सोऽहं ध्यावे, स्वामी शब्द सोऽहं ध्यावे। धूप दीप ले आरती, निज हरि गुण गावे॥

ॐ और सोऽहं शब्द का ध्यान करते हुए, धूप-दीप लेकर आरती करें और प्रभु के गुण गाएँ।

पद २

मंदिर मुकुट त्रिशूल ध्वजा, धर्मों की फहरावे। झालर शंख टिकोरा, नौपत घुररावे॥

मंदिर के शिखर पर त्रिशूल और धर्म की ध्वजा लहराती है, और झालर, शंख और नगाड़े बजते हैं।

पद ३

तीर्थ तालवे गुरु की समाधि, परसे सुरग जावे। अड़सठ तीरथ को फल, समराथल पावे॥

तालवा (मुकाम) में गुरु की समाधि के दर्शन से स्वर्ग मिलता है, और समराथल पर अड़सठ तीर्थों का फल मिलता है।

पद ४

मंझ फागण शिवरात, जातरी रलमिल सब आवे। झिगमिग जोत समराथल, शिम्भू के मन भावे॥

फाल्गुन की शिवरात्रि पर सब यात्री मिलकर आते हैं। समराथल पर जगमगाती ज्योति गुरु शिम्भू (जम्भेश्वर) को प्रिय है।

पद ५

धर्मी करे आनंद भवन पर, पापी थररावे। राजव शरण गुरु की, क्यूं मन भटकावे॥

धर्मी लोग आनंद पाते हैं और पापी काँपते हैं। कवि राजव कहते हैं, गुरु की शरण आ जाओ, मन को क्यों भटकाते हो।

॥ जम्भ भक्ति ॥

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जम्भेश्वर भगवान की आरती, जम्भ भक्ति पर।

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