आरती • अर्थ सहित

ॐ जय जगदीश हरे: हर पंक्ति का अर्थ

सबसे लोकप्रिय आरती, सरल हिंदी में

॥ जम्भ भक्ति ॥

पद १

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे॥

हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो। आप भक्तों के संकट पल भर में दूर कर देते हैं।

पद २

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

जो आपका ध्यान करता है उसे फल मिलता है, मन का दुख मिटता है, घर में सुख-संपत्ति आती है और तन के कष्ट दूर होते हैं।

पद ३

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥

आप ही मेरे माता-पिता हैं, मैं और किसकी शरण लूँ? आपके सिवा कोई दूसरा नहीं जिससे आशा रखूँ।

पद ४

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥

आप पूर्ण परमात्मा हैं और सबके मन की जानते हैं। आप ही परब्रह्म परमेश्वर और सबके स्वामी हैं।

पद ५

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी॥

आप दया के सागर और सबका पालन करने वाले हैं। मैं फल की इच्छा रखने वाला नासमझ सेवक हूँ, आप मेरे स्वामी हैं, कृपा करें।

जानिए

1870 में लिखी गई आरती

यह आरती पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने 1870 में लिखी थी। भगवान विष्णु को समर्पित होने पर भी इसे हर पूजा में गाया जाता है।

॥ जम्भ भक्ति ॥

पूरी आरती पढ़ें

ॐ जय जगदीश हरे की पूरी आरती, सभी पद एक साथ।

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