दीपावली • 8 नवंबर

महालक्ष्मी अष्टकम्

नमस्तेऽस्तु महामाये, अर्थ सहित

॥ जम्भ भक्ति ॥

परिचय

इंद्र की स्तुति

श्री महालक्ष्मी अष्टकम् देवराज इंद्र द्वारा माँ महालक्ष्मी की स्तुति है, जो पद्म पुराण में आती है। दिवाली की सुबह इसका पाठ शुभ माना जाता है।

श्लोक १

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजी, देवताओं से पूजित, हाथों में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी, आपको नमस्कार।

श्लोक २

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि। सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

गरुड़ पर सवार, कोलासुर को भयभीत करने वाली, सब पाप हरने वाली देवी महालक्ष्मी, आपको नमस्कार।

श्लोक ३

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि। सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

सब जानने वाली, सबको वर देने वाली, दुष्टों को भय देने वाली और सब दुख हरने वाली देवी, आपको नमस्कार।

श्लोक ४

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि। मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

सिद्धि और बुद्धि देने वाली, भोग और मोक्ष दोनों देने वाली, मंत्रों की मूर्ति देवी, आपको नमस्कार।

श्लोक ७

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि। परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

कमल के आसन पर विराजी, परब्रह्म स्वरूपा, जगत की माता परमेश्वरी, आपको नमस्कार।

श्लोक ८

श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते। जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

सफेद वस्त्र धारण करने वाली, अनेक आभूषणों से सजी, पूरे जगत में व्याप्त माता, आपको नमस्कार।

फलश्रुति

एक, दो या तीन बार पाठ

स्तोत्र कहता है: रोज़ एक बार पढ़ने से पाप नष्ट होते हैं, दो बार से धन-धान्य मिलता है और तीन बार से शत्रु बाधा दूर होती है, ऐसी मान्यता है।

॥ जम्भ भक्ति ॥

पूरा अष्टकम् पढ़ें

सभी श्लोक और फलश्रुति संस्कृत में।

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