धनतेरस • चालीसा

श्री लक्ष्मी चालीसा

चुनी हुई चौपाइयाँ, सरल अर्थ

॥ जम्भ भक्ति ॥

दोहा

मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥

हे माँ लक्ष्मी, कृपा करके मेरे हृदय में वास करो और मेरी मनोकामनाएँ पूरी करो।

चौपाई

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही॥

हे समुद्र की पुत्री, मैं आपको याद करता हूँ। मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या दो।

चौपाई

क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥

जब क्षीर सागर का मंथन हुआ तो चौदह रत्न निकले, और उनमें सबसे सुखदायी आप थीं।

चौपाई

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥

जब विष्णु जी ने अयोध्या में राम रूप में अवतार लिया, तब आप जनकपुर में सीता बनकर प्रकट हुईं।

चौपाई

मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥

जो मन, कर्म और वचन से आपकी सेवा करता है, उसे मनचाहा फल मिलता है।

चौपाई

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई॥

छल-कपट और चालाकी छोड़कर, मन लगाकर की गई पूजा ही सच्ची पूजा है।

विधि

कैसे पढ़ें

शुक्रवार, धनतेरस या दिवाली को माँ लक्ष्मी के सामने घी का दीपक जलाकर, लाल फूल चढ़ाकर लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें।

अंतिम दोहा

करहु दया की कोर

चालीसा के अंत में रामदास जी हाथ जोड़कर विनती करते हैं: हे माँ लक्ष्मी, इस दास पर दया की कोर करो।

॥ जम्भ भक्ति ॥

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