आरती • धनतेरस विशेष

ॐ जै यक्ष कुबेर हरे

धन के देवता की आरती, अर्थ सहित

॥ जम्भ भक्ति ॥

पद १

ॐ जै यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जै यक्ष कुबेर हरे। शरण पड़े भगतों के, भण्डार कुबेर भरे॥

हे यक्षों के राजा कुबेर, आपकी जय हो। जो भक्त आपकी शरण आते हैं, आप उनके भंडार भर देते हैं।

पद २

शिव भक्तों में भक्त कुबेर बड़े। दैत्य दानव मानव से, कई-कई युद्ध लड़े॥

कुबेर देव भगवान शिव के बड़े भक्त हैं, जिन्होंने दैत्यों और दानवों से कई युद्ध लड़े।

पद ३

स्वर्ण सिंहासन बैठे, सिर पर छत्र फिरे। योगिनी मंगल गावैं, सब जय जय कार करैं॥

वे सोने के सिंहासन पर बैठे हैं, सिर पर छत्र है, योगिनियाँ मंगल गीत गाती हैं और सब जय-जयकार करते हैं।

पद ४

गदा त्रिशूल हाथ में, शस्त्र बहुत धरे। दुख भय संकट मोचन, धनुष टंकार करें॥

हाथ में गदा और त्रिशूल धारण करने वाले कुबेर दुख, भय और संकट दूर करते हैं।

पद ५

मुकुट मणी की शोभा, मोतियन हार गले। अगर कपूर की बाती, घी की जोत जले॥

मणि जड़ा मुकुट और मोतियों का हार उनकी शोभा बढ़ाते हैं। आरती में अगर-कपूर और घी की ज्योति जलती है।

जानिए

धनतेरस पर कुबेर पूजा

धनतेरस की शाम माँ लक्ष्मी के साथ कुबेर देव की पूजा करें और धन रखने की जगह पर दीपक जलाएँ।

॥ जम्भ भक्ति ॥

पूरी आरती पढ़ें

कुबेर देव की पूरी आरती, सभी पद एक साथ।

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