कार्तिक माहात्म्य • अध्याय 1
कार्तिक मास कथा का पहला अध्याय
॥ जम्भ भक्ति ॥
नैमिषारण्य में सूतजी ने ऋषियों को कार्तिक मास की कथा सुनानी शुरू की। मान्यता है कि इसे सुनने से पाप नष्ट होते हैं।
नारद जी के जाने के बाद सत्यभामा प्रसन्न होकर बोलीं कि वे श्रीकृष्ण की सबसे प्यारी रानी हैं और कल्पवृक्ष उनके आँगन में लहराता है।
सत्यभामा ने पूछा, प्रभु! मुझे कार्तिक माहात्म्य सुनाइए, और बताइए मैंने पूर्वजन्म में कौन सा पुण्य किया कि आपकी अर्धांगिनी बनी।
श्रीकृष्ण बोले, तुम्हारी इच्छा के लिए मैं गरुड़ पर बैठकर इंद्रलोक से कल्पवृक्ष लाया था, जिसके लिए इंद्र से युद्ध भी हुआ।
सतयुग के अंत में मायापुरी में देवशर्मा नाम के वेदज्ञ ब्राह्मण रहते थे, जो रोज़ अतिथि सेवा, हवन और सूर्य पूजा करते थे।
बुढ़ापे में उन्हें गुणवती नाम की कन्या हुई। उन्होंने उसका विवाह अपने शिष्य चंद्र से किया, जो उन्हें पिता समान मानता था।
एक दिन देवशर्मा और चंद्र कुश-समिधा लेने हिमालय की तलहटी गए, जहाँ एक राक्षस ने दोनों को मार डाला।
जीवन भर धर्म और सूर्य पूजा करने के कारण भगवान के पार्षद उन्हें वैकुण्ठ ले गए। आगे की कथा अध्याय 2 में है।
॥ जम्भ भक्ति ॥
कार्तिक मास माहात्म्य कथा, अध्याय 1 विस्तार से।
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