बिश्नोई पंथ • गोचारण लीला 1
जाम्भोजी की गोचारण लीला, भाग 1
॥ जम्भ भक्ति ॥
सात वर्ष की बाल लीला पूरी हुई। गाँव के बालक बोले, अब तुम बड़े हो गए, हमारे साथ गायें चराने चलो।
लोहटजी ने बालकों से कहा, कुछ लोग इसे यूँ ही गूँगा कहते हैं। इसे अपने साथ ले जाना और वन में अकेला मत छोड़ना।
सुबह आगे-आगे गायें, पीछे कंधे पर लकुटिया रखे ग्वाल-बाल चले। सबने दोपहर के लिए भोजन और पानी की लोटड़ी बाँध रखी थी।
जाम्भोजी के पास न भोजन था, न जल। बालकों ने कहा, भूख लगेगी तो हम कुछ नहीं देंगे, अभी लौटकर ले आओ।
उत्तर
जाम्भोजी बोले, मुझे भूख-प्यास नहीं सताती। म्हापण को आधारूं, मैं स्वयं अपना आधार हूँ।
गायें चराते हुए वे पीपासर से तीन कोस आगे निकल गए और पीछे मुड़कर नहीं देखा।
टीलों से घिरे वन में उन्होंने सम्भराथल धोरा देखा, जो सुमेरु-कैलाश की तरह सबसे ऊँचा दिख रहा था। सबने ऊपर चढ़ने की इच्छा की।
इस लीला की सीख है: सच्चा संत माँगता नहीं, देता है। आगे चलकर यही समराथल बिश्नोई पंथ का केंद्र बना।
॥ जम्भ भक्ति ॥
श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की गोचारण लीला, विस्तार से।
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