बिश्नोई पंथ • गोचारण लीला 1

जब पहली बार देखा समराथल

जाम्भोजी की गोचारण लीला, भाग 1

॥ जम्भ भक्ति ॥

१

सात वर्ष के बाद

सात वर्ष की बाल लीला पूरी हुई। गाँव के बालक बोले, अब तुम बड़े हो गए, हमारे साथ गायें चराने चलो।

२

लोहटजी की चिंता

लोहटजी ने बालकों से कहा, कुछ लोग इसे यूँ ही गूँगा कहते हैं। इसे अपने साथ ले जाना और वन में अकेला मत छोड़ना।

३

गायों के पीछे

सुबह आगे-आगे गायें, पीछे कंधे पर लकुटिया रखे ग्वाल-बाल चले। सबने दोपहर के लिए भोजन और पानी की लोटड़ी बाँध रखी थी।

४

खाली हाथ जाम्भोजी

जाम्भोजी के पास न भोजन था, न जल। बालकों ने कहा, भूख लगेगी तो हम कुछ नहीं देंगे, अभी लौटकर ले आओ।

उत्तर

मैं किसी से माँगता नहीं, सबको कुछ न कुछ देता हूँ

जाम्भोजी बोले, मुझे भूख-प्यास नहीं सताती। म्हापण को आधारूं, मैं स्वयं अपना आधार हूँ।

५

पीपासर से तीन कोस

गायें चराते हुए वे पीपासर से तीन कोस आगे निकल गए और पीछे मुड़कर नहीं देखा।

६

पहली बार समराथल

टीलों से घिरे वन में उन्होंने सम्भराथल धोरा देखा, जो सुमेरु-कैलाश की तरह सबसे ऊँचा दिख रहा था। सबने ऊपर चढ़ने की इच्छा की।

सीख

देने का भाव

इस लीला की सीख है: सच्चा संत माँगता नहीं, देता है। आगे चलकर यही समराथल बिश्नोई पंथ का केंद्र बना।

॥ जम्भ भक्ति ॥

गोचारण लीला भाग 1 पढ़ें

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की गोचारण लीला, विस्तार से।

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