दिवाली विशेष • स्तोत्र
जब बरसे सोने के आँवले
॥ जम्भ भक्ति ॥
मान्यता है कि बालक आदि शंकराचार्य एक गरीब ब्राह्मणी के घर भिक्षा माँगने पहुँचे। उसके पास देने को कुछ नहीं था।
संकोच में उस स्त्री ने घर में रखा एक सूखा आँवला ही दे दिया। उसकी दरिद्रता देखकर शंकराचार्य का हृदय भर आया।
उन्होंने वहीं माँ लक्ष्मी की स्तुति गाई। कथा है कि प्रसन्न होकर माँ लक्ष्मी ने उस घर पर सोने के आँवलों की वर्षा कर दी।
श्लोक १
जैसे भौंरी कलियों से सजे तमाल वृक्ष पर बैठती है, वैसे ही माँ लक्ष्मी की दृष्टि श्रीहरि के अंगों पर टिकी है।
श्लोक १
सारे ऐश्वर्य समेटे उन मंगल देवी की कटाक्ष-लीला मुझे मंगल प्रदान करे।
श्लोक ८
हे नारायण की प्रिया, दया की हवा से प्रेरित आपके नयनों के बादल मुझ दीन पर धन की धारा बरसाएँ।
श्लोक १२
कमल जैसे मुख वाली और क्षीर सागर से प्रकट हुईं माँ लक्ष्मी को नमस्कार।
दिवाली, अक्षय तृतीया और हर शुक्रवार को कनकधारा स्तोत्र पढ़ने की परंपरा है। आज छोटी दिवाली की शाम भी पढ़ सकते हैं।
॥ जम्भ भक्ति ॥
सभी श्लोक संस्कृत में, जम्भ भक्ति पर।
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