शुक्रवार • व्रत कथा

संतोषी माता व्रत कथा

संतोष और श्रद्धा का फल

॥ जम्भ भक्ति ॥

१

बुढ़िया के सात बेटे

एक बुढ़िया के सात बेटे थे। छह कमाते थे और सातवाँ निकम्मा था। माँ छहों को भोजन कराती और उनकी जूठन सातवें को देती।

२

सच जानकर परदेश

पत्नी के कहने पर सातवें बेटे ने छिपकर यह देखा और दुखी होकर उसी दिन परदेश चला गया। जाते समय पत्नी को अंगूठी दे गया।

३

मेहनत से सेठ बना

परदेश में वह एक साहूकार के यहाँ नौकरी करने लगा। मेहनत और ईमानदारी से कुछ ही वर्षों में वह नामी सेठ बन गया।

४

बहू पर अत्याचार

इधर सास-ससुर उसकी पत्नी से घर का सारा काम कराते, जंगल से लकड़ी मँगवाते और खाने को भूसी की रोटी देते।

५

संतोषी माता का व्रत

एक दिन उसने स्त्रियों को संतोषी माता का व्रत करते देखा। उन्होंने बताया: शुक्रवार को गुड़-चने का भोग लगाकर कथा सुनो, और उद्यापन में खटाई न खाओ।

६

पति की वापसी

व्रत के प्रभाव से पति को उसकी याद आई। उसने धन भेजा और फिर स्वयं घर लौट आया। दोनों सुख से रहने लगे।

७

उद्यापन में भूल

उद्यापन के दिन जेठानी के बच्चों ने पैसे लेकर खटाई खा ली, जिससे संकट आया। बहू ने माता से क्षमा माँगी और फिर से विधिपूर्वक उद्यापन किया।

८

संतोष का फल

माता प्रसन्न हुईं और परिवार में सुख-शांति लौट आई। कथा की सीख है: संतोष और श्रद्धा से हर दुख कट जाता है।

॥ जम्भ भक्ति ॥

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शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा विस्तार से।

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