बुधवार • पौराणिक कथा
गजासुर की अनोखी शिव भक्ति
॥ जम्भ भक्ति ॥
गज और असुर के संयोग से जन्मे असुर का मुख हाथी जैसा था, इसलिए वह गजासुर कहलाया। वह शिवजी का परम भक्त था।
उसने वरदान माँगा कि उसके शरीर से अग्नि निकलती रहे, ताकि कोई कीट-पतंगा उसकी तपस्या में विघ्न न डाले।
हज़ारों साल के तप के बाद शिवजी फिर प्रकट हुए। गजासुर ने माँगा, प्रभु आप कैलाश छोड़कर मेरे उदर में ही वास करें। भोले भंडारी मान गए।
शिवजी कहीं नहीं मिले तो पार्वती जी ने विष्णु जी को याद किया। उन्होंने बताया कि शिव वरदान के कारण गजासुर के उदर में हैं।
श्रीहरि ग्वाला बनकर बाँसुरी बजाने लगे और सजे हुए नंदी ने ऐसा नृत्य किया कि गजासुर प्रसन्न होकर वर माँगने को कहने लगा।
ग्वाले ने शिवजी की मुक्ति माँगी। वचन से बंधे गजासुर ने शिवजी को मुक्त किया और माँगा कि उसका कोई अंश सदा शिव के साथ पूजा जाए।
बाद में जब गणेश जी का शीश अलग हुआ, तो श्रीहरि गजासुर का शीश ही लाए और गणपति को जीवित किया।
इस तरह गजासुर की भक्ति अमर हो गई, और उसका शीश धारण किए गणेश जी हर पूजा में सबसे पहले पूजे जाते हैं।
॥ जम्भ भक्ति ॥
हाथी का शीश ही क्यों श्रीगणेश के लगा, विस्तार से।
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