कार्तिक माहात्म्य • अध्याय 2
सत्यभामा के पूर्वजन्म का रहस्य
॥ जम्भ भक्ति ॥
राक्षस द्वारा पिता और पति के मारे जाने की खबर सुनकर गुणवती विलाप करती हुई बेहोश होकर गिर पड़ी।
होश आने पर उसने घर का सामान बेचकर पिता और पति का श्राद्ध कर्म किया, ताकि उनकी सद्गति हो।
इसके बाद वह उसी नगर में रहकर भगवान विष्णु की भक्ति करने लगी। उसने जीवन भर सभी एकादशी और कार्तिक के व्रत किए।
श्रीकृष्ण कहते हैं: कार्तिक में ब्रह्ममुहूर्त का स्नान, जागरण, दीपदान और तुलसी की रक्षा करने वाले मुझे बहुत प्रिय हैं।
एक बार बुखार में भी वह गंगा स्नान को गई। ठंड से शिथिल होकर उसका देहांत हुआ और भगवान के दूत उसे वैकुण्ठ ले गए।
श्रीकृष्ण बोले: देवशर्मा अब सत्राजित हैं, और हे सत्यभामा, तुम ही वह गुणवती हो। कार्तिक व्रत से ही तुम मेरी अर्धांगिनी बनीं।
तुमने पूर्वजन्म में मंदिर के द्वार पर तुलसी लगाई और दीपदान किया था। उसी पुण्य से आज तुम्हारे आँगन में कल्पवृक्ष है।
कथा कहती है कि दूसरे जप-तप और दान का फल कार्तिक व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता।
॥ जम्भ भक्ति ॥
कार्तिक मास माहात्म्य कथा, अध्याय 2 विस्तार से।
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