बिश्नोई इतिहास

खेजड़ली: पेड़ों के लिए 363 बलिदान

दुनिया का पहला पर्यावरण आंदोलन

॥ जम्भ भक्ति ॥

१

खेजड़ली गाँव, 1730

जोधपुर के पास खेजड़ली गाँव में बिश्नोई परिवार खेजड़ी के पेड़ों को अपने परिवार की तरह पालते थे।

२

राजा का आदेश

जोधपुर महाराजा अभयसिंह के महल के लिए चूना पकाने हेतु लकड़ी चाहिए थी। उनके कारिंदे गिरधरदास भंडारी सैनिकों के साथ खेजड़ी काटने आए।

३

सिर साटे रूंख रहे

अमृता देवी पेड़ से लिपट गईं और बोलीं, सिर कटने पर भी पेड़ बच जाए तो सौदा सस्ता है। सबसे पहले उन्होंने प्राण दिए।

४

363 बलिदान

उनके बाद गाँव और आसपास के 363 बिश्नोई स्त्री-पुरुष एक-एक कर पेड़ों से लिपटते गए और अपने प्राण दे दिए।

५

राजा ने माँगी क्षमा

खबर मिलने पर महाराजा ने पेड़ कटाई रुकवाई, क्षमा माँगी और बिश्नोई गाँवों में हरे पेड़ काटने और शिकार पर रोक का आदेश दिया।

६

आज भी प्रेरणा

खेजड़ली में हर साल भाद्रपद शुक्ल दशमी को मेला लगता है। गुरु जम्भेश्वर का 20वाँ नियम है: हरा वृक्ष नहीं काटना।

॥ जम्भ भक्ति ॥

पूरी गाथा पढ़ें

खेजड़ली के 363 बलिदानियों की पूरी कहानी, जम्भ भक्ति पर।

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