बिश्नोई इतिहास
दुनिया का पहला पर्यावरण आंदोलन
॥ जम्भ भक्ति ॥
जोधपुर के पास खेजड़ली गाँव में बिश्नोई परिवार खेजड़ी के पेड़ों को अपने परिवार की तरह पालते थे।
जोधपुर महाराजा अभयसिंह के महल के लिए चूना पकाने हेतु लकड़ी चाहिए थी। उनके कारिंदे गिरधरदास भंडारी सैनिकों के साथ खेजड़ी काटने आए।
अमृता देवी पेड़ से लिपट गईं और बोलीं, सिर कटने पर भी पेड़ बच जाए तो सौदा सस्ता है। सबसे पहले उन्होंने प्राण दिए।
उनके बाद गाँव और आसपास के 363 बिश्नोई स्त्री-पुरुष एक-एक कर पेड़ों से लिपटते गए और अपने प्राण दे दिए।
खबर मिलने पर महाराजा ने पेड़ कटाई रुकवाई, क्षमा माँगी और बिश्नोई गाँवों में हरे पेड़ काटने और शिकार पर रोक का आदेश दिया।
खेजड़ली में हर साल भाद्रपद शुक्ल दशमी को मेला लगता है। गुरु जम्भेश्वर का 20वाँ नियम है: हरा वृक्ष नहीं काटना।
॥ जम्भ भक्ति ॥
खेजड़ली के 363 बलिदानियों की पूरी कहानी, जम्भ भक्ति पर।
jambhbhakti.com